(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.237. अध्यायः 237
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
महेश्वरेण पार्वतींप्रति यज्ञप्रशंसनम्॥ 1 ॥ तथा देवानां पूजादिफलकथनम्॥ 2 ॥ तथा देवानां मनुष्यचिन्तितविज्ञानसामर्थ्यकथनम्॥ 3 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

उमोवाच।

भगवन्देवदेवेश विशिष्टं यज्ञमुच्यते।
लौकिकं वैदिकं चैव तन्मे शंसितुमर्हसि॥ 13-237-1(90782)
महेश्वर उवाच। 13-237-2x(7647)
देवतानां तु पूजा या यज्ञेष्वेव समाहिता।
यज्ञा वेदेष्वधीताश्च वेदा ब्राह्मणसंयुताः॥ 13-237-2(90783)
इदं तु सकलं दिव्यं दिवि वा भुवि वा प्रिये।
यज्ञार्थं विद्धि तत्सृष्टं लोकानां हितकाम्यया॥ 13-237-3(90784)
एवं विज्ञाय तत्कर्ता सदारः सततं द्विजः।
प्रेत्यभावे लभेल्लोकान्ब्रह्मकर्मसमाधिना॥ 13-237-4(90785)
ब्राह्मणेष्वेव तद्ब्रह्म नित्यं देवि समाहितम्।
तस्माद्विप्रैर्यथाशास्त्रं विधिदृष्टेन कर्मणा॥ 13-237-5(90786)
यज्ञकर्मि कृतं सर्वं देवता अभितर्पयेत्।
ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्चैव यज्ञार्थं प्रायशः स्मृताः॥ 13-237-6(90787)
अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैर्वेदेषु परिकल्पितैः।
सुशुद्धैर्यजमानैस्च ऋत्विग्भिश्च यथाविधिः।
शुद्धैर्द्रव्योपकरणैर्यष्टव्यमिति निश्चयः॥ 13-237-7(90788)
तथा कृतेषु यज्ञेषु देवानां तोषणं भवेत्।
तुष्टेषु सर्वदेवेषु यज्वा यज्ञफलं लभेत्॥ 13-237-8(90789)
देवाः सन्तोषिता यज्ञैर्लोकान्संवर्धयन्त्युत।
उभयोर्लोकयोर्भूतिर्देवि यज्ञे प्रदृश्यते॥ 13-237-9(90790)
तस्माद्यज्वा दिवं गत्वा अमरैः सह मोदते।
नास्ति यज्ञसमं दानं नास्ति यज्ञसमो निधिः॥ 13-237-10(90791)
सर्वधर्मसमुद्देशो देवि यज्ञे समाहितः।
एषा यज्ञकृता पूजा लौकिकीमपरां शृणु॥ 13-237-11(90792)
देवसत्कारमुद्दिश्य क्रियते लौकिकोत्सवः॥ 13-237-12(90793)
देवगोष्ठेऽधिसंस्कृत्य चोत्सवं यः करोति वै।
यागान्देवोपहारांश्च शुचिर्भूत्वा यथाविधि।
देवान्सन्तोषयित्वा स देवि धर्ममवाप्नुयात्॥ 13-237-13(90794)
गन्धमाल्यैश्च विविधैः परमान्नेन धूपनैः।
बह्वीभिः स्तुतिभिश्चैव स्तुवद्भिः प्रयतैर्नरैः॥ 13-237-14(90795)
नृत्तैर्वाद्यैश्च गान्धर्वैरन्यैर्दृष्टिविलोभनैः।
देवसत्कारमुद्दिश्य कुर्वते ये नरा भुवि॥ 13-237-15(90796)
तेषां भक्तिकृतेनैव सत्कारेणैव पूजिताः।
तेनैव तोषं संयान्ति देवि देवास्त्रिविष्टपे॥ 13-237-16(90797)
मानुषैश्चोपकारैर्वा शुचिभिः सत्परायणैः।
ब्रह्मचर्यपरैरेतत्कृतं धर्मफलं लभेत्॥ 13-237-17(90798)
केवलैः स्तुतिभिर्देवि गन्धमाल्यसमाहितैः।
प्रयतैः शुद्धगात्रैस्तु शुद्धदेशे सुपूजिताः।
सन्तोषं यान्ति ते देवा भक्तैः सम्पूजितास्तथा॥ 13-237-18(90799)
देवान्सन्तोषयित्वैव देवि धर्ममवाप्नुयात्॥ 13-237-19(90800)
उमोवाच। 13-237-20x(7648)
त्रिविष्टपस्था वै भूमौ देवा मानुषचेष्टितम्।
कथं ज्ञास्यन्ति विधिवत्तन्मे शंसितुमर्हसि॥ 13-237-20(90801)
महेश्वर उवाच। 13-237-21x(7649)
तदहं तेप्रवक्ष्यामि यथा तैर्विद्यते प्रिये।
प्राणिनां तु शरीरेषु अन्तरात्मा व्यवस्थितः॥ 13-237-21(90802)
आत्मानं परमं देवमिति विद्धि शुभेक्षणे।
आत्मा मनोव्यवस्थानात्सर्वं वेत्ति शुभाशुभम्॥ 13-237-22(90803)
आत्मैव देवास्तद्विद्युरव्यग्रमनसा कृतम्।
सतां मनोव्यवस्थानाच्छुभं भवति वै नृणाम्॥ 13-237-23(90804)
तस्माद्देवाऽभिसम्पूज्या ब्राह्मणानां तथैव च।
यज्ञाश्च धर्मकार्याणि गुरुपूजा च शोभने॥ 13-237-24(90805)
शुद्धगात्रैर्व्रतयुतैस्तन्मयैस्तत्परायणैः।
एवं व्यवस्थितैर्नित्यं कर्तव्यमिति निश्चयः॥ 13-237-25(90806)
एवं कृत्वा शुभाकाङ्क्षी परत्रेह च मोदते।
अन्यथा मन आविश्य कृतं न फलति प्रिये।
ऋतेऽपि तु मनो देवि अशुभं फलति ध्रुवम्॥ ॥ 13-237-26(90807)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 237 ॥


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